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शिखरजी exterior
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शिखरजी

शिखरजी, जिसे ‘पूजनीय शिखर’ भी कहा जाता है, जैन धर्म का सबसे पवित्र तीर्थ स्थल है, जहाँ बीस तीर्थंकरों ने मोक्ष प्राप्त किया था।

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आगंतुक जानकारी

दर्शन शिखरजी

शिखरजी की यात्रा एक गहन आध्यात्मिक अनुभव है, जिसके लिए पारसनाथ पहाड़ी पर चढ़ाई करनी पड़ती है। तीर्थयात्रियों को हजारों सीढ़ियों वाली एक चुनौतीपूर्ण चढ़ाई के लिए तैयार रहना चाहिए, जिसे अक्सर बड़ी श्रद्धा के साथ किया जाता है। यहाँ का वातावरण अत्यंत शांत है, जो प्रार्थनाओं की गूंज और तीर्थंकरों के निर्वाण स्थलों को चिह्नित करने वाले अनेक मंदिरों की उपस्थिति से भरा हुआ है।

मुख्य आकर्षण

  • निर्वाण प्राप्त करने वाले बीस तीर्थंकरों की टोंकों (मंदिरों) के दर्शन करना।
  • सबसे पवित्र जैन तीर्थ स्थल के गहन आध्यात्मिक वातावरण का अनुभव करना।

जानने योग्य बातें

  • शिखर तक की चढ़ाई कठिन हो सकती है, जिसके लिए शारीरिक तैयारी की आवश्यकता होती है।
  • इस पवित्र स्थल पर सम्मानजनक पहनावे और व्यवहार की अपेक्षा की जाती है।

स्थान

Parasnath Hill, Giridih district, Jharkhand, India

समय: प्रतिदिन खुला रहता है, तीर्थयात्रा आमतौर पर सुबह जल्दी शुरू होती है।

कैसे पहुँचें: निकटतम रेलवे स्टेशन पारसनाथ स्टेशन है, और पहाड़ी की तलहटी तक मधुबन से पहुँचा जा सकता है।

दिशा-निर्देश (एक नए टैब में खुलता है)

परिचय

शिखरजी, जिसे सम्मेद शिखरजी के नाम से भी जाना जाता है, जैन धर्म में एक अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है, जिसे दिगंबर और श्वेतांबर दोनों संप्रदायों द्वारा गहराई से पूजा जाता है। भारत के झारखंड के गिरिडीह जिले में पारसनाथ पहाड़ी पर स्थित, यह पहाड़ी लगभग 4,480 फीट (1,370 मीटर) की ऊंचाई तक बढ़ती है, जो इसे झारखंड का सबसे ऊंचा पर्वत बनाती है। यह पवित्र स्थल जैन आध्यात्मिकता और इतिहास का केंद्र है।

जैन धर्म अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह और आत्म-नियंत्रण पर जोर देता है। जैन अनुयायी 24 तीर्थंकरों की शिक्षाओं का पालन करते हैं, जो प्रबुद्ध जीव हैं जिन्होंने सर्वज्ञता प्राप्त की है और मोक्ष के मार्गदर्शक के रूप में कार्य करते हैं। शिखरजी का महत्व इस विश्वास से उत्पन्न होता है कि चौबीस में से बीस तीर्थंकरों ने इसी स्थान पर मोक्ष (पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति) प्राप्त किया था, जिससे यह सबसे महत्वपूर्ण जैन तीर्थ बन गया है, जो गहन आध्यात्मिक महत्व का तीर्थ स्थल है।

शिखरजी की तीर्थयात्रा में शिखर तक एक चुनौतीपूर्ण लेकिन आध्यात्मिक रूप से फलदायी चढ़ाई शामिल है, जिसमें आमतौर पर 4 से 6 घंटे लगते हैं और लगभग 7,200 पत्थर की सीढ़ियाँ हैं। कई तीर्थयात्री पहाड़ी की परिक्रमा करते हैं, और बीस तीर्थंकरों के निर्वाण स्थलों का प्रतिनिधित्व करने वाली टोंकों (मंदिरों) के दर्शन करते हैं। शिखरजी की वास्तुकला विभिन्न शैलियों के सामंजस्यपूर्ण मिश्रण को दर्शाती है, जो निर्माण और जीर्णोद्धार के विभिन्न कालखंडों को प्रदर्शित करती है।

धर्म
जैन धर्म
स्थिति
सक्रिय तीर्थ स्थल
ऊंचाई
4,480 फीट (1,370 मीटर)
20
मोक्ष प्राप्त करने वाले तीर्थंकर
4,480 feet
पारसनाथ पहाड़ी की ऊँचाई
7,200
शिखर तक की सीढ़ियाँ

सामान्य प्रश्न

शिखरजी को सबसे महत्वपूर्ण जैन तीर्थस्थल क्यों माना जाता है?

शिखरजी को उस स्थान के रूप में पूजा जाता है जहाँ चौबीस में से बीस तीर्थंकरों ने मोक्ष प्राप्त किया था, जिससे यह जैनियों के लिए सबसे पवित्र स्थल बन जाता है। उनके निर्वाण स्थलों की उपस्थिति, जिन्हें टोंक (मंदिरों) द्वारा चिह्नित किया गया है, इसके आध्यात्मिक महत्व को अत्यधिक बढ़ा देती है।

पारसनाथ पहाड़ी का क्या महत्व है?

पारसनाथ पहाड़ी झारखंड का सबसे ऊँचा पर्वत है और इसका नाम 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने वहाँ निर्वाण प्राप्त किया था। इस पहाड़ी को स्वयं पवित्र माना जाता है, जो अनगिनत भिक्षुओं और संतों के ध्यान के शक्तिशाली स्पंदनों से ओत-प्रोत है।

शिखरजी की तीर्थयात्रा में क्या शामिल है?

तीर्थयात्रा में पारसनाथ पहाड़ी के शिखर तक की चढ़ाई शामिल है, जिसमें आमतौर पर 4 से 6 घंटे लगते हैं, और लगभग 7,200 पत्थर की सीढ़ियाँ हैं। कई तीर्थयात्री रास्ते में टोंकों के दर्शन करते हुए पहाड़ी की परिक्रमा करते हैं।

शिखरजी की प्रमुख स्थापत्य विशेषताएँ क्या हैं?

शिखरजी की वास्तुकला विभिन्न शैलियों का मिश्रण है, जिसमें नागर शैली के शिखर और द्रविड़ वास्तुकला के तत्व शामिल हैं। मंदिरों का निर्माण संगमरमर और बलुआ पत्थर से किया गया है, जिसमें तीर्थंकरों के चरण पादुकाओं पर विशेष ध्यान दिया गया है।

शिखरजी की यात्रा के लिए कुछ सुझाव क्या हैं?

दोपहर की गर्मी से बचने के लिए सुबह जल्दी चढ़ाई शुरू करें। पानी और नाश्ता साथ रखें। मौसम में अचानक होने वाले बदलावों के लिए तैयार रहें। आरामदायक और गरिमापूर्ण पोशाक पहनें। अधिक समृद्ध अनुभव के लिए एक गाइड साथ लेने पर विचार करें।

समयरेखा

Pre-7th Century BCE

उन्नीस तीर्थंकरों ने निर्वाण प्राप्त किया

पार्श्वनाथ से पहले के उन्नीस तीर्थंकरों (आदिनाथ, वासुपूज्य और नेमिनाथ को छोड़कर) ने सम्मेद शिखर (शिखरजी) में निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया।

मील का पत्थर
772 BCE

भगवान पार्श्वनाथ ने निर्वाण प्राप्त किया

23वें जैन तीर्थंकर, भगवान पार्श्वनाथ ने शिखरजी पहाड़ी पर निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया।

मील का पत्थर
6th Century BCE

सबसे पहला साहित्यिक संदर्भ

शिखरजी को एक तीर्थ (तीर्थस्थल) के रूप में सबसे पहला साहित्यिक संदर्भ जैन धर्म के मूल ग्रंथों में से एक, ज्ञाताधर्मकथांग (Jñātṛdhārmakātha) में मिलता है।

घटना
2nd Century AD

आचार्य पादलिप्त सूरीश्वरजी महाराज ने यात्रा की

आचार्य पादलिप्त सूरीश्वरजी महाराज ने शिखरजी की यात्रा की, जिससे इसका आध्यात्मिक महत्व और बढ़ गया।

घटना
9th Century AD

निर्वाण भूमियों की पहचान की गई

आचार्य प्रद्युम्न सूरीश्वरजी महाराज ने 20 तीर्थंकरों की निर्वाण भूमियों की पहचान की और प्रत्येक स्थान पर निर्वाण स्तूप स्थापित किए।

घटना
13th Century

हस्तलिखित प्रति में पार्श्वनाथ के निर्वाण का चित्रण

कल्पसूत्र और कालकाचार्यकथा की ताड़ के पत्ते की एक हस्तलिखित प्रति में शिखरजी में पार्श्वनाथ के निर्वाण को दर्शाया गया है। वीरचंद ने जिनालयों का पुनर्निर्माण कराया।

घटना
1583

अकबर ने जैन समुदाय को प्रबंधन सौंपा

मुगल सम्राट अकबर ने आसपास के क्षेत्र में पशु वध को रोकने के लिए शिखरजी पहाड़ी का प्रबंधन जैन समुदाय को सौंप दिया।

मील का पत्थर
Around 1670

श्री कुमारपाल सोनपाल लोढ़ा ने जिनालयों का निर्माण कराया

आगरा के श्री कुमारपाल सोनपाल लोढ़ा ने मंदिर परिसर की शोभा बढ़ाते हुए अनेक जिनालयों का निर्माण कराया।

घटना
1678 CE

संस्कृत शिलालेख

एक मूर्ति के चरणों में संस्कृत शिलालेख, जो एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड को दर्शाता है।

घटना
17th Century

पालगंज साम्राज्य शिखरजी तक पहुँचा

पालगंज साम्राज्य की सीमाएँ शिखरजी पहाड़ी की तलहटी तक पहुँच गईं, जिससे इस क्षेत्र पर प्रभाव पड़ा।

घटना
1760

नवाब अहमद शाह बहादुर ने भूमि प्रदान की

बंगाल के नवाब अहमद शाह बहादुर ने शिखरजी पहाड़ी की भूमि मुर्शिदाबाद के जगत सेठों को प्रदान की।

घटना
1768 CE

जगत सेठ द्वारा मंदिरों का पुनर्निर्माण

शिखरजी के मंदिरों की वर्तमान संरचना का पुनर्निर्माण जगत सेठ द्वारा किया गया था, जिससे इसे अपना वर्तमान रूप मिला।

जीर्णोद्धार
1918

इंडियन श्वेतांबर एसोसिएशन ने पहाड़ी खरीदी

इंडियन श्वेतांबर एसोसिएशन आनंदजी कल्याणजी ने 242,000 रुपये में पहाड़ी खरीदी और पवित्र स्थल के पुनर्निर्माण और जीर्णोद्धार का कार्य शुरू किया।

जीर्णोद्धार
1950

बिहार भूमि सुधार अधिनियम

बिहार भूमि सुधार अधिनियम लागू हुआ, जिससे भूमि स्वामित्व प्रभावित हुआ।

घटना
1964

बिहार राज्य ने कब्ज़ा लिया

बिहार राज्य ने शिखरजी पहाड़ी पर पूर्ण अधिकार कर लिया, जिससे प्रशासन में बदलाव आया।

घटना
2019

सम्मेद शिखरजी को तीर्थ यात्रा योजना में शामिल किया गया

दिल्ली सरकार ने तीर्थयात्रा को बढ़ावा देने के लिए मुख्यमंत्री तीर्थ यात्रा योजना के तहत सम्मेद शिखरजी को शामिल किया।

घटना
2012-2017

जिनालयों का पुनर्निर्माण

जिनालयों का पुनर्निर्माण लगभग 2012 में शुरू हुआ और 2017 तक पूरा हुआ, जिससे मंदिर परिसर का विकास हुआ।

जीर्णोद्धार

समान मंदिर

स्रोत एवं शोध

Temples.org पर प्रत्येक तथ्य स्रोत एवं शोध द्वारा समर्थित है। प्रत्येक जानकारी को स्रोत स्तर और विश्वसनीयता के अनुसार वर्गीकृत किया गया है।

Tier A
आधिकारिक आधिकारिक संस्थान से प्राथमिक स्रोत
Tier B
शैक्षणिक सहकर्मी-समीक्षित या विश्वकोश स्रोत
Tier C
द्वितीयक समाचार लेख, यात्रा साइट या सामान्य संदर्भ
Tier D
वाणिज्यिक टूर ऑपरेटर, बुकिंग एजेंसी या प्रचार सामग्री
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